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Tuesday, May 7, 2013

उत्पीडन की कविता होती हैं बेटियाँ



बेटियां दिल होती हैं समाज की

ख़ुशी होती हैं पिता की

दोस्त होती हैं माँ की

आधार होती हैं परिवार की

बेटियां सुबह होती हैं

सृजन की पहली किरण होती हैं

नदी का किनारा होती हैं

भाई का सहारा होती हैं

बेटियां जंगल की लता होती हैं

रिश्तों का पता होती हैं बेटियां

बेटियां घर की रौनक होती हैं

फूलों की महक होती हैं बेटियां

बेटियां धरम होती हैं

मंदिर की घंटियाँ होती हैं बेटियां

बेटियां रास्ता होती हैं करियर की

पतझड़ की कलियाँ होती हैं बेटियाँ

बेटियां बारूद होती हैं प्रेम की

गाँव की नाक होती हैं बेटियां

बेटियां अन्याय की सविता होती हैं

उत्पीडन की कविता होती हैं बेटियाँ

हिरन की तरह जंगल में जीती-मारती हैं बेटियां

सूरज की पहली किरण की तरह पहाड़ों से डरती हैं बेटियाँ

बेटियाँ अनकहा राज होती हैं

अनसुना इतिहास होती हैं बेटियाँ

-रोशन प्रेमयोगी

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