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Saturday, January 16, 2010

बड़ी खतरनाक है नई सुबह

बड़ी खतरनाक है नई सुबह
रात में बहुत ठंढ थी
नींद नही आयी
सोचा था सुबह होने पर खूब नहाऊंगा और गरम खिचडी खाऊँगा
और आफिस जाऊंगा
नहा-खा कर ऑफिस पहुँचा तो कहा गया मंदी की चपेट में हो तुम
घर चला आया
अब तो दिन में भी सर्दी लग रही है
उम्मीद थी की पेट की आग गरमी देगी
पर अब तो बरफ लग रहा है पेट
देवदार लग रहे हैं हाथ
पत्थर लग रही है आँखे
पानी लग रहा है दिमाग
रोशन प्रेमयोगी

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