Thursday, July 12, 2012

अकेले मैं बैठता हूँ तो सिसकता हूँ

इस सावन में
फिर देखने को नहीं मिले झूले
गीली मट्टी में कूदना
नहर के पानी में डुबकी लगाना
भैंस के साथ खेत में जाना
धान के पौधे रोपना
चिड़ियों से बाते करना
ये बचपन की हकीकत है
अब आफिस और घर के बीच रिक्शावान की तरह आता-जाता हूँ
रोज नहाता हूँ लेकिन मन नहीं भीगता
रोज छत पर जाता हूँ लेकिन चिड़िया नहीं मिलतीं
खेत दिखाते हैं लेकिन उनमे दौड़ लगाने में हिचकता हूँ
अकेले मैं बैठता हूँ तो सिसकता हूँ
-रोशन प्रेमयोगी

Thursday, July 28, 2011

अकेले मैं बैठता हूँ तो सिसकता हूँ

इस सावन में


फिर देखने को नहीं मिले झूले


गीली मट्टी में कूदना


नहर के पानी में डुबकी लगाना


भैंस के साथ खेत में जाना


धान के पौधे रोपना


चिड़ियों से बाते करना


ये बचपन की हकीकत है


अब आफिस और घर के बीच रिक्शावान की तरह आता-जाता हूँ


रोज नहाता हूँ लेकिन मन नहीं भीगता


रोज छत पर जाता हूँ लेकिन चिड़िया नहीं मिलतीं


खेत दिखाते हैं लेकिन उनमे दौड़ लगाने में हिचकता हूँ


अकेले मैं बैठता हूँ तो सिसकता हूँ


-रोशन प्रेमयोगी

Friday, June 17, 2011

मुझे भी वोट देना

मेरा घर मनमोहन सिंह की मारुती कार से बड़ा है
मेरी बाइक राहुल गाँधी की बाइक से बड़ी है
मेरी पेन सोनिया गाँधी की पेन से कीमती है
मेरा लैपटॉप दिग्गी राजा के चश्मे से कीमती है
मेरा जूता शशि थरूर के घर से मजबूत है
मेरा गैस चूल्हा कपिल सिब्बल के गालों से ज्यादा चलता है
सो भाई,
अगले चुनाव में मैं भी प्रत्याशी हूँ
मुझे भी वोट देना
रोशन प्रेमयोगी

Friday, June 3, 2011

मेरा साहब

दुखों की कश्ती लेके आया था मेरा साहब
मैंने सागर में उसे पौढ़ा दिया
बहुत नाराज़ है मेरी ख़ुशी से अब मेरा साहब
दुःख की परिभाषा तलाश रहा है शब्दकोशों में
-रोशन प्रेमयोगी

Saturday, October 2, 2010

आश्चर्य गाँधी बचे हुए थे

आश्चर्य गाँधी बचे हुए थे
आज देखा सड़क पर
एक मरी हुई तितली
तितली कहीं नहीं थी
केवल रंग बिरंगे पंख बचे हुए थे
महात्मा गाँधी के विचारों की तरह
साईकिल, मोटरसाईकिल, कार और बसों से
लोग कुचलते हुए निकल रहे थे
आश्चर्य, रंग बिरंगे पंख फिर भी बचे हुए थे
महात्मा गाँधी के विचारों की तरह
-रोशन प्रेमयोगी

Tuesday, August 31, 2010

बहुत याद आती है आम की बाग़

बहुत याद आती है
आम की बाग़ओ गुलेल
चलानाजहाज जैसे पेड़ों पर डाल-डाल
टापनाकच्चा बम्बइया आम खाना
चिलबिल के फल बीनना
अपने बछड़े के पीछे डंडा लेकर
दौड़नाभैंस को नहर-तालाब के पानी में
नहलानाउसकी पूँछ पकडकर
तैरनारात में चोरी से नौटंकी नाच देखने जाना
सुबह पिताजी के थप्पड़
खानाबहुतयाद आता है मेरा
गाँवमाँ उलाहने देती
हैशहर से बहुत हो गया तुम्हे मोह ८ महीने हो गए तुम गाँव नहीं
आयेआंसू भर आते हैं आँखों
मेंनौकरी जरूरी
हैपत्रकारिता पेशे की मजबूरी है
कैसे बताऊँ दलदल में हैं
पांवऔरबहुत याद आता है गाँव
-रोशन प्रेमयोगी

Saturday, May 8, 2010

''लोग उसे माँ कहते हैं''



कसकर बांधे रहती है परिवार को आंचल से
टूटने देती नहीं रिश्तों की डोर
धूप होती है तो बन जाती है घना बादल
शीत पड़ती है तो सुलगती है अंगीठी की तरह
क्रोध भी आये तो लगे है वो प्यार की मूरत
प्यार से लोग उसे माँ-माँ कहते हैं
-रोशन प्रेमयोगी