Wednesday, March 20, 2013

मेरे हमदम मेरे दोस्त लोहिया

मेरे हमदम मेरे दोस्त लोहिया,


हमेशा तुम मेरा मनोबल बढ़ाते हो

तब भी, जब सरकार का भेदभाव निराश करता है

तब भी, जब पुलिस झूठे मुकदमे लिखती है

और जब बच्चियां पेट में मार दी जातीं हैं

राजनीति से लोहिया को बहुत उम्मीद थी

जिसने उनके पिता की कौमी बाल्टी तोड़ दी

खुद लोहिया के सपने धराशाई कर दिए गए

राजनीति के गलियारों में जब लोहिया नाम का शोर होता है

तो मैं कानों पे हथेलियाँ रख लेता हूँ

जिन आंबेडकर को लोहिया अपना हमसफ़र मानते थे

उनको यूपी में राजनीति ने विरोधी बना दिया

जिस लखनऊ में एक लाख मजदूर-किसान

लोहिया के बुलाने पे जुटे थे,

उसमे अब लोहियावाद के जनाजे निकाले जाते हैं

मेरे जिले में लोहिया का नामोनिशान मिट गया

अरे जहाँ लोहिया का जन्म हुआ था

जिस रामायण मेले से

सांस्कृतिक क्रांति की उम्मीद की थी लोहिया ने

उसपर साम्यवाद का भूत सवार हो गया

जिस संसद में रोये थे लोहिया आदिवासियों के लिए

उस संसद में अब करोड़पतियों का बहुमत है

जब यह सब सोचकर थक जाता हूँ

तो लोहिया मेरा मनोबल बढ़ाते हैं

उनके आशावाद का कायल हो जाता हूँ तब

जब वह गरीबों के लिए हाथ फैलाते हैं,

विधानसभा के आगे खड़े होकर

उनकी आवाज़ में तब

मैं भी आवाज मिलाता हूँ

इस उम्मीद में

एक दिन लोकतंत्र में बराबरी आएगी

न्याय सबको मिलेगा

पेट सबका भरेगा

सब बच्चे स्कूल जायेंगे

मजदूर अपने घर के आसपास रोटी कमाएंगे

किसान बुंदेलखंड में भी फसल उगायेंगे

(डॉ राम मनोहर लोहिया को २३ मार्च पर याद करते हुए)

-रोशन प्रेमयोगी

Saturday, March 9, 2013

जिस दिन पहाड़ की दूबों को सब जगह बोऊँगा मैं

बंदरों की तरह उत्पात कर रहे हो रोज


क्यारियों में लगे मेरे फूलों को तोड़ देते हो

वाइरस की तरह घुस जाते हो अब गाँव में भी

गलियों में टंगे मेरे अमन के पोस्टर फाड़ देते हो

कैसे नफ़रत फैलायेंगे तुम्हारी साजिशों के साये

बताओ जिस दिन प्यार का आसमान तान दूंगा मैं

कैसे बच पाएंगे तुम्हारी रासायिनिक खादों से बने उसर-बंजर

बताओ जिस दिन पहाड़ की दूबों को सब जगह बोऊँगा मैं

-रोशन प्रेमयोगी

Friday, January 25, 2013

इस गणतंत्र पर मेरे देश

इस गणतंत्र पर मेरे देश,


महिलाओं को सम्मान देना

बच्चों को स्कूल भेजना

गरीबों को न्याय और रोटी देना

युवाओं को सब्र और संस्कार देना

सरकार को संवेदना देना

अफसरों को इंसान बनाना

नेताओं को सद्बुद्धि देना

किसान को खाद और पानी देना.



इस गणतंत्र पर मेरे देश,

फूलों को महकने देना

चिड़ियों को चहकने देना

घरों को रोशनी देना

अरबपतियों को दिल देना

बच्चियों का ब्याह रोकना

अपराधियों को सलीब देना

कंगालों को नसीब देना



इस गणतंत्र पर मेरे देश,

रचनाकारों को सम्मान देना

दलालों को अपमान देना

बहुमंजिली इमारतों को धूप देना

प्यासों को कूप देना

मुस्कराहटों को रंग देना

पुलिसिया आहटों को ढंग देना

प्रेम को झूले देना

ग्रामीणों को चूल्हे देना



इस गणतंत्र पर मेरे देश,

आँखों को काजल देना

पहाड़ों को बादल देना

वीर शहीदों को ठौर देना

देश की सीमाओं को शांति देना

भीड़ को क्रांति देना

-रोशन प्रेमयोगी

Thursday, January 3, 2013

सेल्यूलाइड की कठपुतलियाँ हैं हम सब



नाचते हैं मन करने पर

गाते हैं बाथरूम में

दिल्ली में युवाओं का प्रदर्शन

अन्ना हजारे का आन्दोलन

कश्मीर की धूप

वाराणसी के सांड का कोई भरोसा नहीं

हमारे आन्दोलन से सरकार नहीं हिलती

राजनेता नहीं कांपते

... समाज नहीं बदलता

मेरा नया साल उदास है

बीते साल राम मनोहर लोहिया से

उनके पसंदीदा नेता के बारे में पूछा,

उन्होंने राजीव गांधी का नाम लिया

आश्चर्य हुआ लेकिन संतोष भी

प. नेहरू की लुटिया डुबोने वाले लोहिया

राजीव गाँधी को दुलारते हैं बीते साल में

मोमबत्ती जलने वाले पीटे जाते हैं नए साल में

उन्ही कांग्रेसी नेताओं के हाथों से, बातों से

जिसके महात्मा गाँधी प्रणेता थे.

देश की बड़ी खबर है कैश सब्सिडी नए साल पर

भ्रूण ह्त्या, लुटे किसान, अन्न विहीन रसोईघर, पानी विहीन नहरे,

किसे बताऊँ मन दुखी है देश के हालात से

जब हर दिल में दर्द है

पर इस दर्द का क्या जब दर्द मोमबत्ती जलने तक दिखता है

एक हाथ जमीन जो मेरी है, के लिए

मेरे पिता सात साल से लड़ रहे हैं

बेटी पर अत्याचार हुआ तो मुन्नर काका कोर्ट नहीं

पुलिस में भी नहीं गए

बेटी को ससुराल भेज कर खुद मुंबई चले गए

मेरे पड़ोस के विलासपुरी राजगीर के पांच बच्चे

नहीं जाने को पाते स्कूल

कर्ज न चुका पाने पर बाराबंकी के मंशाराम ने

कर ली आत्महत्या...

हालात जस के तस

आज़ादी की रौनक फीकी

मन उदास तन बेचैन

गले में खराश

जुबान पर जिंदाबाद-मुर्दाबाद लेकर हम क्रांति करने निकले हैं

हम सेल्यूलाइड की कठपुतलियाँ हैं

-रोशन प्रेमयोगी

..आओ गले मिलें



रंग हैं प्यार में

इनकार में

स्वीकार में

रंग हैं फूलों में

नदियों में

वादियों में

रंग हैं दिनों में

रातों में

बातों में

सपनों में

अपनों में

रंग हैं रिश्तों में

फरिश्तों में

रंग हैं

बच्चों की मुठ्ठियों में

माँ की चिठ्ठियों में

प्रेमिका की गिट्टियों में

जन्मस्थान की मिट्टियों में

यह रंग तुममें है

तुम मुझे दो

मुझमें है

तुमको दूंगा

आओ गले मिलें

नए साल का स्वागत करें

-रोशन प्रेमयोगी

Sunday, December 23, 2012

बेटियां तो पेट में भी सेफ नहीं

जबसे दिल्ली में लड़कियों का आन्दोलन चल रहा है. मैं जुबान बंद करके घर-ऑफिस के बीच सीमित था, आज शारदा गुप्ता ने पूछा, अपने कुछ नहीं लिखा आन्दोलन पर?
तो कहना चाहता हूँ कि बार बार मुझे कुछ साल पहले हंस में छपी मेरी कहानी "तीसरी बेटी" याद आ रही है. भ्रूण हत्या बलात्कार से बड़ा मुद्दा है, गली गली बेटियों के कत्लगाह हैं, अल्ट्रा साउंड केंद्र पेट में बेटियों की पहचान करते हैं और अस्पतालों में बेटियाँ मार दी जाती हैं पेट में ही.
"तीसरी बेटी" कहानी लिखने के बाद कई रात मैं सो नहीं सका था, मैं उन कुछ महिलाओं को जानता हूँ जो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लड़ रही हैं, खुद मैं भी कई साल से. मेरा सवाल सरकार, कोर्ट, क़ानून, महिलाओं, आंदोलनकारियो, संगठनों सबसे है,
"जब महिला के पेट में बेटी सेफ नहीं तो समाज में कैसे होगी?" मेरा यह सवाल खुद से भी है, लेकिन उत्तर मेरे पास नहीं.
-रोशन प्रेमयोगी

Tuesday, November 13, 2012

काश, पटाखों के साथ मंहगाई जल जाए



25 रुपये किलो आलू यानी दूना दाम

10 रुपये में मिर्चा 100 ग्राम

मोमबत्ती 210 रुपये किलो

दाल 90 रुपये

सरसों का तेल 110 में

इस दिवाली दोस्तों, मैंने बच्चों को कपडे नहीं दिलाये

500 ग्राम आफिस से मिली, 500 ग्राम बाज़ार से खरीदी

पत्नी जिद कराती रहीं लेकिन

सजावट के लिए झालर नहीं आई

दोस्तों इस दीवाली दीप जलाते समय लगा

दिल भी जल रहा है.

रोटी, दाल, दूध और सब्जी, बच्चों की फीस

वेतन तो ऐसे उडता है जैसे कलाई से इत्र

प्रधानमंत्री मनमोहन अपनी पीठ लाख ठोंकें

1999 में 1500 वेतन पाता था, ज्यादा खुश था

2012 में 19000 महीने के अंत तक

गूलर का फूल हो जाता है

हे सरकार, तुम्हारा सर्वनाश हो

हमारे दिल की आह तुमको लगे

नेताओं तुम्हारे हाथ में लोहे की जंजीरे हो

विश्वबैंक के इशारों पर चलने वाले

तुमको अंत समय कंधे न मिले

सोचता हूँ,

विधवा, निरीह, विकलांग कैसे पीते होंगे पसावन दाल की जगह

गरीबो की रोटी कैसे पकती होगी

इस मनमोहन युग में


-रोशन प्रेमयोगी