Sunday, September 25, 2016
वे हिन्दी के लेखक हैं, बहुत नाराज हैं...
हिन्दी के सारे थके लोग
कलम पकड़कर चिल्ला रहे हैं
वे बहुत गुस्से में हैं
वे सचमुच बहुत गुस्से में हैं
उनके हाथ में तलवार दे दी जाए तो मार आएंगे
हिमालय के उस पर जाकर तीतर-बटेर
उन्हें हवाई जहाज दे दिए जाएं तो दाग आएंगे
चांद और सूर्य पर गुमान के गोले
उन्हें सांसद बना दिए जाए तो वे उखाड़ देंगे
सरकार और संविधान के कील-पेंच
पर उन्हें कोई कुछ नहीं दे रहा
उन्हें कोई देख भी नहीं रहा
उनको सुनने के लिए श्रोता भी नहीं हैं
फिर भी वे चिल्ला रहे हैं
माइक पर गूंज रही हैं उनकी आवाजें
वे माइक पर चिल्लाते हुए
कई-कई गिलास पानी पी जा रहे हैं।
वे हिन्दी के लेखक हैं
वे बहुत गुस्से में हैं
हालांकि अभी तक मैं यह नहीं जान सका
कि वे नाराज किससे हैं?
पाठकों से? प्रकाशकों से? सरकार से? समाज से?
या फिर हाशिए पर पहुंच जाने के लिए जिम्मेदार अपने आप से?
-रोशन प्रेमयोगी
Sunday, September 11, 2016
प्रकृति मेरी मुट्ठी में नहीं मैं उसकी मुट्ठी में
जब से इंसानों के बनाये
घर, रेल, हवाई जहाज और जिमखाने के साइज बड़े होने लगे
कुंठा से ग्रस्त होकर
पहाड़, पेड़, ग्लेशियर और झील छोटे होने लगे
इंसान ने जब इनकी कुंठा देखी तो उसने ठहाके लगाये
उसने पहाड़, पेड़, ग्लेशियर और झील सब अपने ड्राइंग रूम-
और लान में बना दिए,
और उसने दिखा दिया,
प्रकृति उसकी मुट्ठी में है
वह हर तरह के सृजन कर सकता है
भगवान को भी बना और बिगाड़ सकता है
मैंने भी इन्नोवेटिव और अहंकारी इनसान बनने की सफल कोशिश की
बना लिया घर अपने गाँव के टीले से ऊँचा
उसमें बरगद, पीपल, नीम्बू... सबको बोनसाई बना दिया
रोज उनको पानी देता था
इसके बाद उनकी औकात को आइना दिखाता था
और ठहाका लगाते हुए उनसे कहता था-
इंसान ही है इस दुनिया का सृजनकर्ता
लेकिन कल रात १५ मार्च तक यानी आधे महीने में
यूपी में ०७ सेमी बारिश हुई
और दनादन किसान आत्महत्या करने लगे
फसलें नष्ट होने से
तो आज सुबह छत पर पहुँचने पर मेरी दम्भी मुस्कान गायब थी
मैंने गमलों में मुस्कुराते पौधों को पहले
इसके बाद उगते सूरज को सिर झुकाकर नमन किया
और आग्रह किया
मेरे देश-दुनिया के किसानों को बचा लो
वे अन्न दाता हैं
और तुम्हारे टुकड़ों पर पलते हैं
और मैं भी.
-रोशन प्रेमयोगी
Tuesday, January 26, 2016
शनिधाम में महिलाओं को प्रवेश दिलाये
कोर्ट, सरकार और यह समाज...
शनिधाम शिगनापुर, अहमदनगर, महाराष्ट्र में हजारों महिलाएं दर्शन के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं, और यह पुरुष प्रधान समाज मुंह पर पट्टी बांधकर मौन है. इसी तरह यह समाज तब भी मौन था, जब कालाराम मंदिर, नासिक में रमाबाई अम्बेडकर को दर्शन-पूजन नहीं करने दिया गया था, जिसके बाद बाबा साहेब अम्बेडकर ने 1930 में मंदिर में दलितों-महिलाओं को प्रवेश दिलाने के लिए पहले सत्याग्रह किया, सफलता नहीं मिली तो कानूनी लड़ाई लड़ी. तब भी सफलता नहीं मिली. इस बीच कालाराम मंदिर में दर्शन की हसरत मन में ही लिए रमाबाई अम्बेडकर मर गईं. उसके बाद बाबा साहेब अम्बेडकर ने संकल्प लिया कि मैं पैदा तो हिन्दू के रूप में हुआ, लेकिन मरूंगा किसी और धर्म में. वह बाद में बौद्ध हो गए.
पुजारी इस देश में क्या धर्म के ठेकेदार हैं?--
मेरा सवाल यह है कि हिन्दू धर्म क्या पुजारियों का है?
और इसके धर्माचार्य लाखों-करोड़ों पूजा के नाम पर कमाने वाले पुजारी हैं?
जी नहीं. यह धर्म पुजारियों के कारण सिर्फ संकीर्ण हुआ है. पुजारी धर्म के सौदागर है. इन पुजारियों के तंग करने पर कभी अयोध्या में तुलसीदास को मस्जिद में शरण लेने और मांग कर पेट पालने का फैसला करना पड़ा था, जो लाखों पुजारी अवधी भाषा में रामायण लिख देने से तुलसी से नाराज हो गए थे, उनके वंशज रामचरितमानस का सौदा करने लगे हैं.
आज करोड़ों हिन्दू जब मनुस्मृति की जगह बाबा साहेब अम्बेडकर के नेतृत्व में संविधान सभा के बनाये संविधान से गवर्न होते हैं, और इस पर उन्हें गर्व है तो किसी शनिधाम पर पुजारियों का कानून कैसे चल सकता है.
जिस दौर में शंकराचार्य दलितों को सन्यास की दीक्षा दे रहे हों, दिगंबर अखाडा, अयोध्या के तत्कालीन महंथ रामचन्द्रदास पटना के हनुमान मंदिर में दलित पुजारी बना रहे हों, शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती मंदिर में दलितों को प्रवेश न देने पर विद्रोह करते हुए भगवान के विग्रह को मन्दिरनुमा रथ पर लेकर दर्शन-पूजन करवाने के लिए दलितों की बस्ती में ले जाने जैसा क्रन्तिकारी काम करते हों, उस समय में शनिधाम के पुजारी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को कैसे रोक सकते हैं?
शंकराचार्य करें हस्तक्षेप--
देश के सभी शंकराचार्य मिलकर इस मामले में हस्तक्षेप करें. वे पुजारियों को बताएं कि आदि शंकराचार्य सन्यासी होने के बाद भी अपनी माँ का शव दाह-प्रवाह के लिए खुद अपने कंधे पर ले गए थे. और भगवान शंकर तो सती का शव लेकर पूरे ब्रह्माण्ड में घूमे थे. जब वे स्त्री को अछूत नहीं मानते थे तो उनके ही स्वरूप शनि देवता की पूजा का अधिकार कैसे कुछ पुजारी मिलकर छीन सकते हैं?
पुजारी- पंडित न भूलें, स्त्री के बलपर दुनिया में धर्म जिन्दा है इन समाजों में. स्त्रियां पूजा करती हैं, इसलिए दुनिया के लाखों-करोड़ों धर्मस्थल अरबों-खरबों की कमाई करते हैं. जिस दिन महिलाएं पूजा बंद कर देंगी, धर्म के लाखों ठेकेदार दक्षिणा न मिलने से भूखों मरने लगेंगे.
सर्वोच्च कोर्ट और सरकारों से अपील--
मेरा अनुरोध है,
देश के प्रधानमंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अहमदनगर के शनिधाम मंदिर का अधिग्रहण करने का आदेश दें. ताकि वहां सबको पूजा का अधिकार मिले,
वे यह काम करने में अक्षम हों तो प्लीज, देश की सर्वोच्च कोर्ट यह काम खुद संज्ञान लेकर करे.
मेरे आँखों में आंसू हैं और आक्रोश भी--
पुजारिओं के आतंक और मनमानी से मैं बहुत आहत हूँ. दुखी हूँ और मेरे आँखों में आंसू हैं और आक्रोश भी. स्त्री वर्ग और जाति के नाम पर समाज के कई वर्गों को मंदिर में जाने से रोकने वालों का सर्वनाश हो. यही ईश्वर से कामना है.
-रोशन प्रेमयोगी
Sunday, September 8, 2013
हे दंगा कराने वाले धर्म, तुम्हारा सर्वनाश हो
चुरकी-दाढ़ी-खतना-कड़ा का अर्थ न जानने वाले बच्चों को भी तुम मरवा देते हो.
अपने रूई-सूत से मतलब रखने वाले गरीबों पर तुम कहर ढाते हो.
तुमने ८४ में हजारों सिखों को मरवाया
तुमने ईराक-इरान को लड़वाया
तुम गोधरा काण्ड कराते हो
तुम मुंबई के अमन में आग लगाते हो
तुमने अयोध्या से तुलसीदास को भगाया
तुमने वाराणसी में कबीर और नजीर बनारसी को नहीं रहने दिया
तुम हर साल लाखों बच्चों से दुनिया में पिता छीन लेते हो
तुम तिब्बतियों को आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हो
तुमने कश्मीर से पंडितों के परिवारों को खदेड़ा
तुमने शिव के काशी में किया बखेड़ा
तुमने बोधगया में बम दगावाया
तुमने गणेश शंकर विद्यार्थी को मरवाया
तुमने भारत का विभाजन कराया
तुमने एंग्लो इंडियन का सर्वनाश कराया
तुम हत्यारे हो
तुम अपराधी हो
तुम पापी हो
दुनिया में अमन के लिए तुम्हारा सर्वनाश हो.
-रोशन प्रेमयोगी
Monday, June 10, 2013
सब करना लेकिन आत्महत्या न करना
आज एक लड़की ने मुझे फोन किया. मेरे लेखन की तारीफ की. कुछ देर बाद फिर फोन आया. उसने बताया कि वह एक लडके से बहुत प्यार करती है. एक साल से लडके ने दूरी बनानी शुरू कर दी. उसने जोर दिया तो लडके के माता-पिता उसे देखने आये और नापसंद कर दिया. अब जिंदगी बेकाम लगाती है. आत्महत्या करना चाहती हूँ. मैंने लडके को फोन करके पूछा, कि जिसे तुम इतना प्यार करते थे. वह खराब कैसे हो गई, लडके ने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया. लड़की ने बताया न वह लडके को भूल पा रही, और न जीने की नयी राह दिख रही. मैंने उसकी हावीज पूछी, पढाई में उसने बीए और एक प्रोफेशनल कोर्स किया है. मैंने उससे पूछा, इश्वर को मानती हो? उसने हाँ कहा. मैंने कहा, हो सकता है इश्वर ने तुम्हारी जोड़ी किसी और के साथ बनाई हो, तो उसका इंतजार करो, जिसने तुमको ठुकरा दिया, उसकी यादों के पीछे भागन मूर्खता है. अपने करियर पर ध्यान दो, और हाँ, आत्महत्या सपने में भी न करना. वह मान गई. मुझे फिर फोन करने के वादे के साथ.
-रोशन प्रेमयोगी
Tuesday, May 7, 2013
उत्पीडन की कविता होती हैं बेटियाँ
बेटियां दिल होती हैं समाज की
ख़ुशी होती हैं पिता की
दोस्त होती हैं माँ की
आधार होती हैं परिवार की
बेटियां सुबह होती हैं
सृजन की पहली किरण होती हैं
नदी का किनारा होती हैं
भाई का सहारा होती हैं
बेटियां जंगल की लता होती हैं
रिश्तों का पता होती हैं बेटियां
बेटियां घर की रौनक होती हैं
फूलों की महक होती हैं बेटियां
बेटियां धरम होती हैं
मंदिर की घंटियाँ होती हैं बेटियां
बेटियां रास्ता होती हैं करियर की
पतझड़ की कलियाँ होती हैं बेटियाँ
बेटियां बारूद होती हैं प्रेम की
गाँव की नाक होती हैं बेटियां
बेटियां अन्याय की सविता होती हैं
उत्पीडन की कविता होती हैं बेटियाँ
हिरन की तरह जंगल में जीती-मारती हैं बेटियां
सूरज की पहली किरण की तरह पहाड़ों से डरती हैं बेटियाँ
बेटियाँ अनकहा राज होती हैं
अनसुना इतिहास होती हैं बेटियाँ
-रोशन प्रेमयोगी
Saturday, April 13, 2013
तुम्हारे न होने से क्या फर्क पड़ता है अम्बेडकर
सूरज उगने जैसा था तुम्हारा इस दुनिया से जाना
तुम्हारी २२ प्रतिज्ञाएँ हमें याद नहीं लेकिन
हम तुमको दिल में बसाते हैं आलिन्द की तरह
मेरे गाँव से दो कोस दूर नहर किनारे लगी है तुम्हारी मूर्ति
फिर भी लगता है दिन निकलने की तरह तुम्हारे विचारों का प्रकाश
मेरे चारों ओर मौजूद है
तुम्हारे विचार मुझमे मस्ती भरते हैं,
झकझोरते हैं और लड़ने की हिम्मत देते हैं.
यह सच है कि कुछ नेहरू और तमाम गाँधी तुम्हारी जोत के आगे
पहाड़ बनाकर खड़े हो जाते हैं बार-बार
लेकिन क्या फर्क पड़ता है, जब जोत से जोत जलती जा रही है
लगातार, हजारों-हजार
मजदूर तुम्हारा नाम याद करके दुःख भूल जाते हैं
दलित तुमको तब पुकारते हैं जब उनको पट्टा मिलता है
कुछ विस्वा जमीन का
और वह खुद को गर्व से किसान कहते हैं
तुम्हारी किताबें लेकर मेरे घर के सामने से
अब अक्सर निकलता है विद्यार्थियों का रेला
और अंगूठाटेक दादियाँ गाती हैं गीत तुम्हारी महिमा की
रमाबाई को तुम पंढरपुर के कालेराम का दर्शन नहीं करा सके
आज तुम्हारे दर्शन को लाखों लोग जुटते हैं
क्या यह कम है ?
नहीं लगे तुम्हारे नाम के आगे-पीछे राष्ट्रपति-प्रधानमन्त्री जैसे पद
क्या फर्क पड़ता है जब अरबों लोग मानते हैं तुम्हारा संविधान
कभी-कभी लगता है तुम अब इतिहास हो, देवता हो
कभी-कभी लगता है तुम नेता हो, अभिनेता हो, प्रणेता हो मेरे, मेरी पीढ़ी के
फिर लगता है तुम सिर्फ पति हो सविता कबीर के
फिर लगता है तुम बेटे हो महादेव अम्बेडकर के
सबसे ज्यादा लगता है कि तुम मसीहा हो गरीबों के
जिसके पास भी नहीं था स्वाभिमान इस दुनिया में
उसके तुम मुकुट हो सोने के हीरे के
जिन बच्चों का कोई नाम नहीं था,
जाति हो तुम उन करोड़ों नौनिहालों के
तुम्हारे न होने से क्या फर्क पड़ता है
जब गली-गली में खड़े हैं तुम्हारे विचारों के लैम्प-पोस्ट
हे भीमराव,
सच कहने की काबिलियत मुझमे तुमसे है
तुमसे मिला हार का भी जश्न मनाने का हुनर
तुमने मुझे पढ़ने के लिए मजबूर किया
तुमने लड़ने के लिए क़ानून का हथियार दिया
जब लाखों बच्चे भूखे हैं, मजदूर हैं, मजबूर हैं, अनपढ़ हैं
जब करोड़ों लोगों के सपने हैं धूल-धूसरित
रुकना नहीं चाहता मैं सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए
क्योंकि तुमने मुझे झंडा लेकर आगे चलने की जिम्मेदारी भी दिया
-रोशन प्रेमयोगी
Wednesday, April 3, 2013
लड़ने जाऊंगा घर की गौरैया पार्टी से
०२ अप्रैल २०१३ को गाँव गया
खाना खाने के लिए बरामदे में बैठा तो गौरैया आ गई
मां ने कहा थोडा सा चावल दे दो
मैंने दे दिया
... गौरैया ने तीन दाने चावल के खाए
फिर आ गई मेरे सामने
आँखों से आँखें मिलीं
निडर गौरैया मेरे और करीब आ गई
मां, इसे देखो डर नहीं रही मुझसे
एक टुकड़ा रोटी दे दो- मां ने कहा
मैंने रोटी का टुकड़ा दे दिया
उसने दो-तीन बार चोंच मारकर रोटी खाई
और फिर मेरे सामने
निडर, देखने लगी मेरी आँखों में
मां, यह फिर आ गई! -मैं चिल्लाया.
भाग रे, मोरे बिटवा को खाना न खाने देगी क्या? मां ने उसे डपटा
उसने मां की ओर देखा, तो
मैंने उसकी ओर देखा
वह पंख फड़फड़ाती हुई छत की सीढ़ी पर गई
मुझे ख़ुशी हुई
मैंने जोर से ताली बजाई,
"हे, डर के भाग गई गौरैया"
अचानक तेजी से वह लौटी
मेरी दाल की कटोरी पर बैठ
उसने चोंच में तीन बार भर-भर कर दाल पीया
अम्मा! मैं बच्चे की तरह जोर से चिल्लाया,
देखो मां, इसकी ढिठाई, मेरी दाल जूठी कर दी
रुक बुरलौनी, अभी बताती हूँ- मां दौड़ती हुई आई
गौरैया फुर्र से उड़ गई
हैंडपंप के ऊपर जा बैठी
घूरने लगी मुझे
कुछ देर बाद अपने साथी के साथ मेरे पास आई
लड़ने के लिए.
मुझे महात्मा गाँधी की अहिंसा याद आई
देखो, मैं तुम लोगों से लड़ना नहीं चाहता
दोस्ती करना है तो बोलो? मैंने कहा
वह दोनों खुश हो गए
उन्होंने जमीन से उठाकर चावल के दाने खाए
रोटी का टुकड़ा कुतरा
फिर मेरे गिलास से पानी पिया
और दोनों उड़ गए छत की ओर
दोपहर में पापा के कमरे में उनसे फिर मुलाकात हुई
खिड़की में उनका घोंसला है
बहन ने बताया उनके तीन बच्चे थे
दो जमीन पर गिरकर मर गए
एक पूरे घर में शोर मचाता है
मां ने बताया घर में गौरैया के तीन घोसले हैं
मुझे बहुत ख़ुशी हुई
मैंने पपीते के पेड़ों सा कहा,
जल्दी बड़े हो जाओ
ताकि बड़े बड़े फल लगे तुम्हारी डालियों में
घर के पीछे स्थित
आम की बाग़ में इस साल बौर नहीं आये हैं
तुम्हारा ही सहारा है
तुम्हारे फलों के लिए मैं लड़ने आऊंगा
घर की गौरैया पार्टी से
-रोशन प्रेमयोगीSee More
Wednesday, March 20, 2013
मेरे हमदम मेरे दोस्त लोहिया
मेरे हमदम मेरे दोस्त लोहिया,
हमेशा तुम मेरा मनोबल बढ़ाते हो
तब भी, जब सरकार का भेदभाव निराश करता है
तब भी, जब पुलिस झूठे मुकदमे लिखती है
और जब बच्चियां पेट में मार दी जातीं हैं
राजनीति से लोहिया को बहुत उम्मीद थी
जिसने उनके पिता की कौमी बाल्टी तोड़ दी
खुद लोहिया के सपने धराशाई कर दिए गए
राजनीति के गलियारों में जब लोहिया नाम का शोर होता है
तो मैं कानों पे हथेलियाँ रख लेता हूँ
जिन आंबेडकर को लोहिया अपना हमसफ़र मानते थे
उनको यूपी में राजनीति ने विरोधी बना दिया
जिस लखनऊ में एक लाख मजदूर-किसान
लोहिया के बुलाने पे जुटे थे,
उसमे अब लोहियावाद के जनाजे निकाले जाते हैं
मेरे जिले में लोहिया का नामोनिशान मिट गया
अरे जहाँ लोहिया का जन्म हुआ था
जिस रामायण मेले से
सांस्कृतिक क्रांति की उम्मीद की थी लोहिया ने
उसपर साम्यवाद का भूत सवार हो गया
जिस संसद में रोये थे लोहिया आदिवासियों के लिए
उस संसद में अब करोड़पतियों का बहुमत है
जब यह सब सोचकर थक जाता हूँ
तो लोहिया मेरा मनोबल बढ़ाते हैं
उनके आशावाद का कायल हो जाता हूँ तब
जब वह गरीबों के लिए हाथ फैलाते हैं,
विधानसभा के आगे खड़े होकर
उनकी आवाज़ में तब
मैं भी आवाज मिलाता हूँ
इस उम्मीद में
एक दिन लोकतंत्र में बराबरी आएगी
न्याय सबको मिलेगा
पेट सबका भरेगा
सब बच्चे स्कूल जायेंगे
मजदूर अपने घर के आसपास रोटी कमाएंगे
किसान बुंदेलखंड में भी फसल उगायेंगे
(डॉ राम मनोहर लोहिया को २३ मार्च पर याद करते हुए)
-रोशन प्रेमयोगी
हमेशा तुम मेरा मनोबल बढ़ाते हो
तब भी, जब सरकार का भेदभाव निराश करता है
तब भी, जब पुलिस झूठे मुकदमे लिखती है
और जब बच्चियां पेट में मार दी जातीं हैं
राजनीति से लोहिया को बहुत उम्मीद थी
जिसने उनके पिता की कौमी बाल्टी तोड़ दी
खुद लोहिया के सपने धराशाई कर दिए गए
राजनीति के गलियारों में जब लोहिया नाम का शोर होता है
तो मैं कानों पे हथेलियाँ रख लेता हूँ
जिन आंबेडकर को लोहिया अपना हमसफ़र मानते थे
उनको यूपी में राजनीति ने विरोधी बना दिया
जिस लखनऊ में एक लाख मजदूर-किसान
लोहिया के बुलाने पे जुटे थे,
उसमे अब लोहियावाद के जनाजे निकाले जाते हैं
मेरे जिले में लोहिया का नामोनिशान मिट गया
अरे जहाँ लोहिया का जन्म हुआ था
जिस रामायण मेले से
सांस्कृतिक क्रांति की उम्मीद की थी लोहिया ने
उसपर साम्यवाद का भूत सवार हो गया
जिस संसद में रोये थे लोहिया आदिवासियों के लिए
उस संसद में अब करोड़पतियों का बहुमत है
जब यह सब सोचकर थक जाता हूँ
तो लोहिया मेरा मनोबल बढ़ाते हैं
उनके आशावाद का कायल हो जाता हूँ तब
जब वह गरीबों के लिए हाथ फैलाते हैं,
विधानसभा के आगे खड़े होकर
उनकी आवाज़ में तब
मैं भी आवाज मिलाता हूँ
इस उम्मीद में
एक दिन लोकतंत्र में बराबरी आएगी
न्याय सबको मिलेगा
पेट सबका भरेगा
सब बच्चे स्कूल जायेंगे
मजदूर अपने घर के आसपास रोटी कमाएंगे
किसान बुंदेलखंड में भी फसल उगायेंगे
(डॉ राम मनोहर लोहिया को २३ मार्च पर याद करते हुए)
-रोशन प्रेमयोगी
Saturday, March 9, 2013
जिस दिन पहाड़ की दूबों को सब जगह बोऊँगा मैं
बंदरों की तरह उत्पात कर रहे हो रोज
क्यारियों में लगे मेरे फूलों को तोड़ देते हो
वाइरस की तरह घुस जाते हो अब गाँव में भी
गलियों में टंगे मेरे अमन के पोस्टर फाड़ देते हो
कैसे नफ़रत फैलायेंगे तुम्हारी साजिशों के साये
बताओ जिस दिन प्यार का आसमान तान दूंगा मैं
कैसे बच पाएंगे तुम्हारी रासायिनिक खादों से बने उसर-बंजर
बताओ जिस दिन पहाड़ की दूबों को सब जगह बोऊँगा मैं
-रोशन प्रेमयोगी
क्यारियों में लगे मेरे फूलों को तोड़ देते हो
वाइरस की तरह घुस जाते हो अब गाँव में भी
गलियों में टंगे मेरे अमन के पोस्टर फाड़ देते हो
कैसे नफ़रत फैलायेंगे तुम्हारी साजिशों के साये
बताओ जिस दिन प्यार का आसमान तान दूंगा मैं
कैसे बच पाएंगे तुम्हारी रासायिनिक खादों से बने उसर-बंजर
बताओ जिस दिन पहाड़ की दूबों को सब जगह बोऊँगा मैं
-रोशन प्रेमयोगी
Friday, January 25, 2013
इस गणतंत्र पर मेरे देश
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
महिलाओं को सम्मान देना
बच्चों को स्कूल भेजना
गरीबों को न्याय और रोटी देना
युवाओं को सब्र और संस्कार देना
सरकार को संवेदना देना
अफसरों को इंसान बनाना
नेताओं को सद्बुद्धि देना
किसान को खाद और पानी देना.
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
फूलों को महकने देना
चिड़ियों को चहकने देना
घरों को रोशनी देना
अरबपतियों को दिल देना
बच्चियों का ब्याह रोकना
अपराधियों को सलीब देना
कंगालों को नसीब देना
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
रचनाकारों को सम्मान देना
दलालों को अपमान देना
बहुमंजिली इमारतों को धूप देना
प्यासों को कूप देना
मुस्कराहटों को रंग देना
पुलिसिया आहटों को ढंग देना
प्रेम को झूले देना
ग्रामीणों को चूल्हे देना
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
आँखों को काजल देना
पहाड़ों को बादल देना
वीर शहीदों को ठौर देना
देश की सीमाओं को शांति देना
भीड़ को क्रांति देना
-रोशन प्रेमयोगी
महिलाओं को सम्मान देना
बच्चों को स्कूल भेजना
गरीबों को न्याय और रोटी देना
युवाओं को सब्र और संस्कार देना
सरकार को संवेदना देना
अफसरों को इंसान बनाना
नेताओं को सद्बुद्धि देना
किसान को खाद और पानी देना.
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
फूलों को महकने देना
चिड़ियों को चहकने देना
घरों को रोशनी देना
अरबपतियों को दिल देना
बच्चियों का ब्याह रोकना
अपराधियों को सलीब देना
कंगालों को नसीब देना
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
रचनाकारों को सम्मान देना
दलालों को अपमान देना
बहुमंजिली इमारतों को धूप देना
प्यासों को कूप देना
मुस्कराहटों को रंग देना
पुलिसिया आहटों को ढंग देना
प्रेम को झूले देना
ग्रामीणों को चूल्हे देना
इस गणतंत्र पर मेरे देश,
आँखों को काजल देना
पहाड़ों को बादल देना
वीर शहीदों को ठौर देना
देश की सीमाओं को शांति देना
भीड़ को क्रांति देना
-रोशन प्रेमयोगी
Thursday, January 3, 2013
सेल्यूलाइड की कठपुतलियाँ हैं हम सब
नाचते हैं मन करने पर
गाते हैं बाथरूम में
दिल्ली में युवाओं का प्रदर्शन
अन्ना हजारे का आन्दोलन
कश्मीर की धूप
वाराणसी के सांड का कोई भरोसा नहीं
हमारे आन्दोलन से सरकार नहीं हिलती
राजनेता नहीं कांपते
... समाज नहीं बदलता
मेरा नया साल उदास है
बीते साल राम मनोहर लोहिया से
उनके पसंदीदा नेता के बारे में पूछा,
उन्होंने राजीव गांधी का नाम लिया
आश्चर्य हुआ लेकिन संतोष भी
प. नेहरू की लुटिया डुबोने वाले लोहिया
राजीव गाँधी को दुलारते हैं बीते साल में
मोमबत्ती जलने वाले पीटे जाते हैं नए साल में
उन्ही कांग्रेसी नेताओं के हाथों से, बातों से
जिसके महात्मा गाँधी प्रणेता थे.
देश की बड़ी खबर है कैश सब्सिडी नए साल पर
भ्रूण ह्त्या, लुटे किसान, अन्न विहीन रसोईघर, पानी विहीन नहरे,
किसे बताऊँ मन दुखी है देश के हालात से
जब हर दिल में दर्द है
पर इस दर्द का क्या जब दर्द मोमबत्ती जलने तक दिखता है
एक हाथ जमीन जो मेरी है, के लिए
मेरे पिता सात साल से लड़ रहे हैं
बेटी पर अत्याचार हुआ तो मुन्नर काका कोर्ट नहीं
पुलिस में भी नहीं गए
बेटी को ससुराल भेज कर खुद मुंबई चले गए
मेरे पड़ोस के विलासपुरी राजगीर के पांच बच्चे
नहीं जाने को पाते स्कूल
कर्ज न चुका पाने पर बाराबंकी के मंशाराम ने
कर ली आत्महत्या...
हालात जस के तस
आज़ादी की रौनक फीकी
मन उदास तन बेचैन
गले में खराश
जुबान पर जिंदाबाद-मुर्दाबाद लेकर हम क्रांति करने निकले हैं
हम सेल्यूलाइड की कठपुतलियाँ हैं
-रोशन प्रेमयोगी
..आओ गले मिलें
रंग हैं प्यार में
इनकार में
स्वीकार में
रंग हैं फूलों में
नदियों में
वादियों में
रंग हैं दिनों में
रातों में
बातों में
सपनों में
अपनों में
रंग हैं रिश्तों में
फरिश्तों में
रंग हैं
बच्चों की मुठ्ठियों में
माँ की चिठ्ठियों में
प्रेमिका की गिट्टियों में
जन्मस्थान की मिट्टियों में
यह रंग तुममें है
तुम मुझे दो
मुझमें है
तुमको दूंगा
आओ गले मिलें
नए साल का स्वागत करें
-रोशन प्रेमयोगी
Sunday, December 23, 2012
बेटियां तो पेट में भी सेफ नहीं
जबसे दिल्ली में लड़कियों का आन्दोलन चल रहा है. मैं जुबान बंद करके घर-ऑफिस के बीच सीमित था, आज शारदा गुप्ता ने पूछा, अपने कुछ नहीं लिखा आन्दोलन पर?
तो कहना चाहता हूँ कि बार बार मुझे कुछ साल पहले हंस में छपी मेरी कहानी "तीसरी बेटी" याद आ रही है. भ्रूण हत्या बलात्कार से बड़ा मुद्दा है, गली गली बेटियों के कत्लगाह हैं, अल्ट्रा साउंड केंद्र पेट में बेटियों की पहचान करते हैं और अस्पतालों में बेटियाँ मार दी जाती हैं पेट में ही.
"तीसरी बेटी" कहानी लिखने के बाद कई रात मैं सो नहीं सका था, मैं उन कुछ महिलाओं को जानता हूँ जो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लड़ रही हैं, खुद मैं भी कई साल से. मेरा सवाल सरकार, कोर्ट, क़ानून, महिलाओं, आंदोलनकारियो, संगठनों सबसे है,
"जब महिला के पेट में बेटी सेफ नहीं तो समाज में कैसे होगी?" मेरा यह सवाल खुद से भी है, लेकिन उत्तर मेरे पास नहीं.
-रोशन प्रेमयोगी
तो कहना चाहता हूँ कि बार बार मुझे कुछ साल पहले हंस में छपी मेरी कहानी "तीसरी बेटी" याद आ रही है. भ्रूण हत्या बलात्कार से बड़ा मुद्दा है, गली गली बेटियों के कत्लगाह हैं, अल्ट्रा साउंड केंद्र पेट में बेटियों की पहचान करते हैं और अस्पतालों में बेटियाँ मार दी जाती हैं पेट में ही.
"तीसरी बेटी" कहानी लिखने के बाद कई रात मैं सो नहीं सका था, मैं उन कुछ महिलाओं को जानता हूँ जो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लड़ रही हैं, खुद मैं भी कई साल से. मेरा सवाल सरकार, कोर्ट, क़ानून, महिलाओं, आंदोलनकारियो, संगठनों सबसे है,
"जब महिला के पेट में बेटी सेफ नहीं तो समाज में कैसे होगी?" मेरा यह सवाल खुद से भी है, लेकिन उत्तर मेरे पास नहीं.
-रोशन प्रेमयोगी
Tuesday, November 13, 2012
काश, पटाखों के साथ मंहगाई जल जाए
25 रुपये किलो आलू यानी दूना दाम
10 रुपये में मिर्चा 100 ग्राम
मोमबत्ती 210 रुपये किलो
दाल 90 रुपये
सरसों का तेल 110 में
इस दिवाली दोस्तों, मैंने बच्चों को कपडे नहीं दिलाये
500 ग्राम आफिस से मिली, 500 ग्राम बाज़ार से खरीदी
पत्नी जिद कराती रहीं लेकिन
सजावट के लिए झालर नहीं आई
दोस्तों इस दीवाली दीप जलाते समय लगा
दिल भी जल रहा है.
रोटी, दाल, दूध और सब्जी, बच्चों की फीस
वेतन तो ऐसे उडता है जैसे कलाई से इत्र
प्रधानमंत्री मनमोहन अपनी पीठ लाख ठोंकें
1999 में 1500 वेतन पाता था, ज्यादा खुश था
2012 में 19000 महीने के अंत तक
गूलर का फूल हो जाता है
हे सरकार, तुम्हारा सर्वनाश हो
हमारे दिल की आह तुमको लगे
नेताओं तुम्हारे हाथ में लोहे की जंजीरे हो
विश्वबैंक के इशारों पर चलने वाले
तुमको अंत समय कंधे न मिले
सोचता हूँ,
विधवा, निरीह, विकलांग कैसे पीते होंगे पसावन दाल की जगह
गरीबो की रोटी कैसे पकती होगी
इस मनमोहन युग में
-रोशन प्रेमयोगी
Monday, October 22, 2012
उसके सीने से लगने को मन करता है
मेरे पीछे कौर लेकर दौड़ती थी, बेटा खा ले भूखे बच्चो को डायन पकड़ ले जाती है. सोकर उठता तो बालों से ठन्डे तेल की खुशबु आती, सुबह नहाने से पहले उबटन लगाना वह कभी न भूलती, स्कूल जाता तो देसी घी के लड्डू रस्ते भर बसते से खुशबु विखेरते. नौकरी के लिए घर क्या छुटा, माँ का प्यार छूट गया. जाता हूँ जब पूजा घर में इस नवरात्र में, माँ का साया दिखता है, उसका चेहरा नहीं भूलता, उसके सीने से लगने को मन करता है, माँ से कब बच्चे का मन भरता है. -रोशन प्रेमयोगी
Sunday, September 30, 2012
मेरे अरमान हैं मैं चाँद बनूँ तारे बनूँ
हरेक डाल फूलों से लदे महके फिजा
खुलें पगडंडियों पर माल, गुलज़ार हों चौपाल भी
बड़ा हो आसमान गरीबों का भी देश में
...मेरे अरमान हैं मैं बिजली बनूँ बाँध बनूँ
खिले सूरजमुखी गेहूं की बालियाँ झूमें
सब्जियां पहुंचे आदिवासियों की भी रसोई में
बुंदेलखंड को पानी मिले ओडिशा को अन्न
मेरे अरमान हैं खेतों में गिरुं बीज बनूँ
नहीं सुनतीं सरकारें अंग्रेज हैं आफिसों के बाबू
बहुत मजबूर है यह देश दंश सहते हुए
न्याय पाने को यहाँ बिकते हैं खेत, आबरू भी
मेरे अरमान हैं पञ्च बनूँ परमेश्वर बनूँ
निकलो साथियों आओ जला दें उम्मीदों की लौ
तुम सूरज बनो सुखा दो दुखों का सागर
थोड़ी रोशनी हो संसद के पिछवाड़े भी
मेरे अरमान हैं मैं चाँद बनूँ तारे बनूँ.
(मेरे क्योंकि मैं लोहिया हूँ उपन्यास का अंश)
-रोशन प्रेमयोगी
हरेक डाल फूलों से लदे महके फिजा
खुलें पगडंडियों पर माल, गुलज़ार हों चौपाल भी
बड़ा हो आसमान गरीबों का भी देश में
...मेरे अरमान हैं मैं बिजली बनूँ बाँध बनूँ
खिले सूरजमुखी गेहूं की बालियाँ झूमें
सब्जियां पहुंचे आदिवासियों की भी रसोई में
बुंदेलखंड को पानी मिले ओडिशा को अन्न
मेरे अरमान हैं खेतों में गिरुं बीज बनूँ
नहीं सुनतीं सरकारें अंग्रेज हैं आफिसों के बाबू
बहुत मजबूर है यह देश दंश सहते हुए
न्याय पाने को यहाँ बिकते हैं खेत, आबरू भी
मेरे अरमान हैं पञ्च बनूँ परमेश्वर बनूँ
निकलो साथियों आओ जला दें उम्मीदों की लौ
तुम सूरज बनो सुखा दो दुखों का सागर
थोड़ी रोशनी हो संसद के पिछवाड़े भी
मेरे अरमान हैं मैं चाँद बनूँ तारे बनूँ.
(मेरे क्योंकि मैं लोहिया हूँ उपन्यास का अंश)
-रोशन प्रेमयोगी
Saturday, September 15, 2012
शारदा बहुत गुस्से में है
विदेशी कंपनियों के साथ ही वह प्रधानमंत्री को भी सबक सिखाना चाहती है. वह सोच रही की एफ़डीआइ से देश का बहुत नुक्सान होगा. वह मुझसे भी नाराज है कि मैं कुछ कर क्यों नहीं रहा. मैं भी नाराज हूँ सरकार से, लेकिन मैं चुप हूँ, देश जल रहा है मंहगाई कि आग में. मैं भी झुलस रहा हूँ लेकिन मैं चुप हूँ. सिर्फ शारदा का गुस्सा देख रहा हूँ. शारदा कि तरह लाखों भारतीय नाराज है. मैं सिर्फ उनकी नाराजगी को जिन्दा रखना चाहता हूँ. मैं नहीं चाहता कि नौजवान घरों से निकलकर उपद्रव करें, मैं चाहता हूँ यह गुस्सा ज्वालामुखी बने. आंधी बने. इसीलिए मैं हवा तेज करना चाहता हूँ. तो शारदा अपने घर कि खिड़कियाँ खोल दो, ताकि तुम्हारे मन कि आग ज्वालामुखी बने, तुम दुआ भी करो, लाखों लाखों नौजवानों के मन की आग धधकती रहे. देखना एक दिन उस आग में तपकर यह देश फिर सोना बनेगा.
-रोशन प्रेमयोगी
विदेशी कंपनियों के साथ ही वह प्रधानमंत्री को भी सबक सिखाना चाहती है. वह सोच रही की एफ़डीआइ से देश का बहुत नुक्सान होगा. वह मुझसे भी नाराज है कि मैं कुछ कर क्यों नहीं रहा. मैं भी नाराज हूँ सरकार से, लेकिन मैं चुप हूँ, देश जल रहा है मंहगाई कि आग में. मैं भी झुलस रहा हूँ लेकिन मैं चुप हूँ. सिर्फ शारदा का गुस्सा देख रहा हूँ. शारदा कि तरह लाखों भारतीय नाराज है. मैं सिर्फ उनकी नाराजगी को जिन्दा रखना चाहता हूँ. मैं नहीं चाहता कि नौजवान घरों से निकलकर उपद्रव करें, मैं चाहता हूँ यह गुस्सा ज्वालामुखी बने. आंधी बने. इसीलिए मैं हवा तेज करना चाहता हूँ. तो शारदा अपने घर कि खिड़कियाँ खोल दो, ताकि तुम्हारे मन कि आग ज्वालामुखी बने, तुम दुआ भी करो, लाखों लाखों नौजवानों के मन की आग धधकती रहे. देखना एक दिन उस आग में तपकर यह देश फिर सोना बनेगा.
-रोशन प्रेमयोगी
Friday, August 24, 2012
'क्योंकि मैं लोहिया हूँ'
"मैंने महात्मा गाँधी के महान सपनों का हश्र देख लिया था. इसलिए मेरा
दृष्टिकोण साफ़ था. आज भी मैं यही कहता हूँ, "सोने जैसे विचारों से भगवान्
बुद्ध की मूर्ति तो बनाई जा सकती है, बुद्ध को जन जन तक नहीं पहुँचाया जा
सकता....
"मैंने महात्मा गाँधी के महान सपनों का हश्र देख लिया था. इसलिए मेरा
दृष्टिकोण साफ़ था. आज भी मैं यही कहता हूँ, "सोने जैसे विचारों से भगवान्
बुद्ध की मूर्ति तो बनाई जा सकती है, बुद्ध को जन जन तक नहीं पहुँचाया जा
सकता....
बुद्धत्व को आम आदमी तक पहुचाने के लिए किसी बौद्ध को लंगोट बांधकर
अखाड़े में कूदना होगा. याद रखो, जिस दिन यहाँ के सबसे भ्रष्ट अधिकारी को
हज़रत गंज चौराहे पर उठाकर पटक दोगे, उसके अगले दिन देश के कई हिस्सों
में कई भ्रष्ट अधिकारीयों पर जूते पड़ेंगे."
मेरे जल्द प्रकाशित होने वाले उपन्यास 'क्योंकि मैं लोहिया हूँ' का अंश
-रोशन प्रेमयोगी
अखाड़े में कूदना होगा. याद रखो, जिस दिन यहाँ के सबसे भ्रष्ट अधिकारी को
हज़रत गंज चौराहे पर उठाकर पटक दोगे, उसके अगले दिन देश के कई हिस्सों
में कई भ्रष्ट अधिकारीयों पर जूते पड़ेंगे."
मेरे जल्द प्रकाशित होने वाले उपन्यास 'क्योंकि मैं लोहिया हूँ' का अंश
-रोशन प्रेमयोगी
Friday, July 27, 2012
दो वीरांगनाओं को नमन
वह कैप्टन लछमी सहगल थीं
कानपुर में रहती थीं
कई बार उनसे मिला
हर बार उनको गौर से निहारता
मन में सवाल होता कैसे इतनी सुन्दर लड़की फौजी बनी
इस कोमलांगी को देखकर क्या सोचते रहे होंगे नेताजी सुभाष
एक बार मैंने यह सवाल मानवती आर्या से पूछा
वह ठहाका मारकर हंसाने लगी, बोली,
यह सवाल तो मेरे दिमाग में आया ही नहीं
अन्यथा नेताजी से पूछती.
यह सवाल एक बार सहगल से पूछ लिया.
उन्होंने सवाल किया, वाकई मैं खूबसूरत हूँ?
सुभाष बाबू ने तो कभी नहीं बताया.
वह तो वीरांगना कहते थे.
उनको तो मेरे बाजुओं में हाथी का बल दिखता था.
वह तो सवा लाख अंग्रेजों से मुझे अकेले लड़ाना चाहते थे.
मैंने एक दिन मानवती आर्या से पूछा,
जवानी में तो आप राजकुमारी लगती रही होंगी
आपने कोमल बिस्तर के रंगीन सपनों की दुनिया छोड़ फौजी बनने की क्यों ठानी?
उन्होंने सवाल किया, आजादी से रंगीन सपना रोमांस का होता है क्या?
तो मेरा दो वीरांगनाओं को नमन
आज कैप्टन लछमी सहगल नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के पास चली गईं
मानवती आर्या ने भी अपना सामान बाँध रखा है.
कलम उनकी जय बोल कलम
उनको "जय" बोल.
-रोशन प्रेमयोगी
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